Tuesday, February 23, 2016

Bhagwaan ki paribhasha

ना जाऊ मैं मंदिर न गिरजा, न ही अल्लाह पाक के
बंट जाता हैं इंसान अब, कभी धर्म से कभी जात से

क्यूँ भूलते है सब की यहाँ, हस्ती सभी की ख़ाक है
बिछी है लकीरे हर तरफ,  ये हिन्द है यह पाक है

हर धर्म के गुरु है यहाँ फिर भी सभी अनजान है
एक ही रास्ता दिखाते बाइबिल, गीता और  क़ुरान है

मुझको तो भगवान से लगने लगे ये किसान है
खाने के हक़दार सब है क्या हिन्दू क्या मुसलमान है

ऊँच नीच किसने पढ़ाया पाठ ये जाने न कोए
बस यूँ ही खुद आँख मूंदे भेड़ चाल है चल रहे

पूछते थे सब ये मुझसे  क्या बनोगे हो बड़े
जानते थे वो की इंसान रहना तो मुश्किल हुआ

कोई न ऐसा  धर्म पर जो हो सिखाता मारना
हैवान न बनो ये तुम्हारे धर्म का ही अपमान है

मुझसे कोई जात पूछे, धर्म पूछे तो मैं कहुँ
दिल में जिसके इंसान है, वो इंसान ही भगवान  है

No comments:

Post a Comment